
पाप तो इतिहास के आरम्भ से ही हमारे संग-संग चल रहा है, उसकी उपासना हमने अभी शुरु की है महात्मा गाँधी जी के शब्दों में पाप को परिभाषित किया गया । पाप से हमारा अभिप्राय वे कर्म या आचरण है जो नैतिकता का उलंधन (पतन) करते है वे कार्य जो किसी व्यक्ति, समाज, देश ...
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