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जून 2008


ब्लॉग्स (13)
शिष्टाचार की अभिव्यक्ति समाज, देश और परिस्थिति के भेद से अभिव्यक्ति के तरीकों में अन्तर हो सकता हैं, परन्तु उनका सर्वमान्य आधार ही दूसरों के प्रति सम्मान, स्वयं का नम्रता व मार्धयमय व्यवहार झलके-छलके जिसे प्रभावित व्यक्ति आपके व्यवहार की तारीफ करें बिना न ... आगे पढ़ें...

पाप तो इतिहास के आरम्भ से ही हमारे संग-संग चल रहा है, उसकी उपासना हमने अभी शुरु की है महात्मा गाँधी जी के शब्दों में पाप को परिभाषित किया गया । पाप से हमारा अभिप्राय वे कर्म या आचरण है जो नैतिकता का उलंधन (पतन) करते है वे कार्य जो किसी व्यक्ति, समाज, देश ... आगे पढ़ें...

गांधी जी का हिन्दी के प्रति लगावगांधी जी ने सन १९०८ में अपनी छोटी-सी पुस्तक "हिन्द स्वराज्य" में कहा, "हर एक पढे-लिखे हिन्दुस्तानी को अपनी भाषा का, हिन्दु को संस्कृत का, मुसलमान को अरबी का, फारसी को परिशयन का और सबको हिन्दी का ज्ञान होना चाहिए । कुछ ... आगे पढ़ें...