
दुलसीदास की पत्नी अपने पिता के घर गई हुई थी । उन्हें पत्नी से मिलने की तीव्र उत्कण्ठा हुई । अंधेरी रात में वर्षा हो रही थी । अंधेरी रात में वर्षा हो रही थी । उसकी परवा किये बिना चल दिये । रास्ते में उमड़ती नदी पड़ी एक बहते हुए मुर्दे के सहारे उन्होंने नदी पार की । ससुराल पहुँचे तो वहाँ लोगों को जगाना उन्होंने उचित न समझा और पिछवाड़े से परनाले पर लटके सांप को रस्सी समझकर उसे पकड़ा और ऊपर चढ़ गये और पत्नी के पास पहुँचे ।
पत्नी रत्नावली ने कहाँ - यदि आपकी इतनी ही प्रति भगवान से हो जाए तो उन्हें प्राप्त कर आप जीवन को धन्य बना सकते हो । तुलसीदास को यह वचन चुभ गये और उन्होंने सच्चे भक्त की तरह अजर अमर लोकसेवक बन गये । आज सारा संसार उन्हें इसी रुप में जानता है ।

...............................................स्त्रोत - संस्कृति-संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता ...............................................

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