आमतौर पर नेता और अफसर का प्रयोग करने में स्वयं कदाचित लज्जित अनुभव करते हैं, फिर उन्हीं राजनेताओं, अफसरों द्वारा हिन्दी उत्थान कार्यक्रम हिन्दी दिवस मनाये जाते है मात्र १० से १५ मिनट के भाषण, गोष्ठी द्वारा अपने साल में एक बार आये हिन्दी दिवस पर वर्ष भर हिन्दी बोलने व हिन्दी में कार्य करने पर जोर दिया जाता है । ऐसे कार्यक्रम का क्या प्रभाव जब वे स्वयं ही राष्ट्रभाषा छोड़ विदेशी भाषा का मोह त्याग नही पाते ।
कुछ इस प्रकार हिन्दी में बातचीत करना अपने कार्यालय में शर्म महसूस करते है जबकि इन कार्यालयों में हिन्दी अपनाने के हिन्दी दिवस पर लगाये तक्त भी दिवाल धूल खाते दिखाई देते है । जो लोग अंग्रेजी बोलने में ही अपनी शान समझते है वे यह क्यों भूल जाते है कि वेवजह विदेशी भाषा उपयोग करना मातृभाषा, राष्ट्रभाषा को अपमानित करने जैसा ही है हिन्दी के देश में हिन्दी की इस तरह अपेक्षा विचारणीय है ? विचारणीय है कि राष्ट्रभाषा के रुप में हिन्दी को अपनाया गया है तो फिर अंग्रेजी में बातचीत करना, कही यह सिद्ध तो नही करती है कि हम स्वयं हिन्दी पर अंग्रेजी हावी होने दे रहे है जिसके जुम्मुदार हम स्वयं ही है ?

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